Maa Nanda Devi Raj Jaat Yatra: 280 किमी की पैदल धार्मिक यात्रा

Nanda devi raj jaat yatra- जब मैं छोटी थी तब इस जात्रा (यात्रा) के बारे में सुना था। मेरे मामा जी, जो अब इस दुनिया में नहीं है वह इस यात्रा में शामिल हो रहे थे। उनसे मैंने इसके बारे में सुना था।

मुझे भी इस धार्मिक यात्रा में शामिल होना था पर क्योकि में बहुत छोटी तो ऐसा हो नहीं पाया।

इसके आलावा मेरे स्कूल की हिंदी पुस्तक में भी इस जात्रा के बारे में मेने पढ़ा था। हमारे उत्तराखंड में कई जगह धार्मिक यात्रा को “जात्रा” कहा जाता है। तो इस शब्द को किसी तरह की गलती न समझे।

2014 के बाद 2026 में अगली नंदा देवी राजजात की आयोजित की जाएगी। आइये जानते है इस यात्रा के बारे में की कैसे यह उत्तराखंड वासियो के लिए महत्वपूर्ण है।

नंदा देवी राजजात यात्रा क्या है?

nandadevi rajjaat yatra ka chausingha khadu
चौसिंघा खाडू

नंदा देवी को उत्तराखंड में बेटी और देवी दोनों रूपों में पूजा जाता है। इस यात्रा को “नंदा देवी की विदाई यात्रा” भी कहा जाता है, जिसमें उन्हें मैत (मायके) से ससुराल (हिमालय) तक विदा किया जाता है।

लगभग 280 किमी की यह यात्रा एशिया की सबसे लम्बी पैदल यात्रा है। पहाड़ो के दुर्गम स्थानों और मौसम के उतार-चढ़ाव के बीच यहाँ यात्रा संपन होती है।

नंदा देवी राजजात को ‘हिमालय महाकुम्भ’ के नाम से भी जाता है। हर 12 सालों के बाद इस यात्रा का आयोजन किया जाता है।

चमोली के नौटी गांव से शुरू होने वाली इस जात्रा में इस गांव में एक चौसिंगिया खाडू (Chausingha Khadu) यानी 4 सींगो वाला भेड़ जन्म लेता है।

यही चौसिंघा खाडू इस पूरी यात्रा में सबसे आगे चलता है और वह लदा हुआ होता है भक्तो द्वारा दी गयी भेट से।

नंदा देवी राजजात का महत्व

ऐसा माना जाता है की नंदा देवी जो माता पार्वती का ही स्वरुप है वह अपने मैत (मायके) आती है जिसके बाद इस यात्रा का आयोजन माता की मायके से विदाई के लिए किया जाता है। 

परम्परा के अनुसार, परिवार वाले ध्याणी (अपनी विवाहित बेटी या बहन) को ससुराल छोड़ने जाते है उसी तरह माँ नंदा को उनके ससुराल कैलाश विदा करने के लिए सभी गांव वाले जाते है।

नंदा देवी राजजात का इतिहास 

इस यात्रा का इतिहास सैकड़ों साल पुराना माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा कत्युरी और चंद राजाओं के समय से चली आ रही है।

कहाँ से शुरू होती है नंदा देवी राजजात यात्रा

नंदा देवी राजजात की छंतोलिया

यह जात्रा उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जनपद में नौटी गांव से शुरू होती है और होमकुंड में पूरी होती है। इसके आगे का रास्ता चौसिंगिया खाडू खुद तय करता है। 

इस यात्रा में माता की डोली को सजाकर ले जाया जाता है और साथ में कई सारी छंतोली (छत्र) भी होती है। अपने दसवे पड़ाव पर कुमाऊं की छंतोलिया भी शामिल हो जाती है।

यह छंतोली रिंगाल से बनी होती है जिसे Hill Bamboo भी कहते है, जो गढ़वाल और कुमाऊँ में पायी जाती है।

Nanda devi raj jaat yatra route/ नंदा देवी राजजात यात्रा के पड़ाव

नंदा देवी राजजात के पड़व इस तरह से है-

नौटी से ईड़ा बधाणी फिर वापस नौटी के बाद कंसुआ – सेम – कोटी  – भगोती -कुलसारी – चेपड़ों – नन्द केसरी – फल्दिया गांव – मुन्दोली – वाण – गरौली पाताल – बेदनी – पातर नचौड़िया – शिला समुद्र अंत में होमकुंड पहुंचते है।

होमकुंड से आगे चौसिंगा खाडू को आगे की यात्रा के लिए अकेले छोड़ दिया जाता है। और इस अंतिम पड़ाव के बाद सभी यात्री होमकुंड से 16 किमी वापस चलकर चंदनिया घाट और फिर सुतोल पहुंचते है यहाँ से बस द्वारा नंदनगर घाट और फिर नौटी पहुंच जाते है।

नंदा देवी राजजात यात्रा कितने दिन की होती है?

अगर आप सोच रहे है की नंदा देवी राजजात यात्रा कितने दिनों तक चलती है? तो आपको यह बता दे कि जात्रा (यात्रा) लगभग 20 दिनों तक चलती है।

इस यात्रा का भव्य आयोजन होता है, नौटी गांव से निकलने के बाद जैसे-जैसे यह यात्रा आगे बढ़ती है इसमें अन्य गांव के लोग जुड़ते चले जाते है।

हर पड़ाव में पूजा पाठ और यात्रियों के खाने की व्यवस्था उसी गांव के लोग करते है। जहां गांव नहीं होते, वहाँ से श्रद्धालु अपने लिए भोजन सामग्री स्वयं ले जाते है। 

माता की सजी हुई डोली के साथ, गढ़वाल के पारंपरिक ढोल-दमाऊ और रंग बिरंगी छतोलियों के साथ यात्रा आगे बढ़ती चलती है।

छोटी राजजात

हर साल नंदा देवी राजजात का आयोजन किया जाता है जिसे छोटी जात भी कहते है जिसमे गढ़वाल के लोग शामिल होते है। और बड़ी जात जो हर 12 साल में आयोजित की जाती है।

निष्कर्ष

नंदा देवी की यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं है, यह एक बेटी की विदाई का भावनात्मक सफर है। कई वर्षो बाद जब माता अपने मायके आती है तो माता को उनकी विदाई के समय उपहार दिए जाते है।

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