Krishna janmashtami में dahi handi की धूम, जानिए क्यों मनाया जाता है dahi handi festival, और क्या है इसका महत्व

Dahi Handi Festival (दही हांड़ी पर्व) भगवान श्रीकृष्ण के जन्म यानी कि कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन ही पूरे भारतवर्ष में बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है जो कि एक बेहद रोमांचक और लोकप्रिय पर्व है। कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।

यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण से जुडी हुई उनकी बचपन की शरारतों को याद करते हुए मनाया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में तो इस पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

इस आर्टिकल में हम आपके लिए दही हांड़ी से जुडी जानकारी लेकर आये है तो आइये जानते है कि दही हांड़ी कब, कैसे और क्यों मनाई जाती है और क्या है इसका महत्व।

दही हांडी 2025: दही हांडी कैसे मनाई जाती है?

दही हांड़ी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के नटखट बचपन पर आधारित है। दही हांड़ी के दिन ऊंचाई पर एक मटकी सजाई जाती है जिसे तोड़ने के लिए युवाओ की टीम बनायीं जाती है।

इस मटकी में दही, मक्खन, मिठाईया और नकद इनाम रखा जाता है। युवा मिलकर अपनी अपनी टीम बनाते है जिन्हे गोविंदा पथक कहा जाता है सभी मिलकर मानव पिरामिड बनाते है और सबसे ऊपर चढ़ा हुआ खिलाडी मटकी को फोड़ता है।

मटकी इतनी ऊंचाई पर सजाई होती है कि इसमें सभी टीमों को मटकी फोड़ने का बराबर मौका मिलता है। दही हांड़ी पर्व के आयोजन का गोविंदा आला रे! नारा बन गया है।

इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली टीमें प्रतियोगिता से पहले इसका अभ्यास भी करते है। इस प्रकार जो टीम इस प्रतियोगिता को जीतती है उसे उचित नकद इनाम दिया जाता है।

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2025 में कब मनाई जाएगी दही हांडी?

हर साल की तरह इस साल भी कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांड़ी का पर्व पूरे भारतवर्ष में मनाया जायेगा। उदयतिथि के अनुसार 16 अगस्त 2025 को कृष्ण जन्मोत्सव पूरे भारतवर्ष में मनाया जाएगा व इसके अगले दिन यानी की 17 अगस्त 2025 को सुबह 9 बजे से शाम के 6 बजे तक दही हांड़ी का उत्सव मनाया जायेगा।

वैसे तो सम्पूर्ण भारत में ही दही हांड़ी का पर्व मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में इस उत्सव बड़े स्तर पर मनाया जाता है।

भारतवर्ष में दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है?

दही हांड़ी पर्व का आयोजन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओ को याद करते हुए मनाया जाता है जो बचपन में अपने गाँव के घरों से मक्खन चुरा कर खाया करते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को माखन चोर नाम से भी जाना जाता है।

श्रीकृष्ण से अपनी हांडियों को सुरक्षित रखने व मक्खन को उनकी पहुंच से दूर रखने के लिए ग्रामीणों ने हांड़ी को ऊँचे स्थान पर लटकाना शुरू कर दिया लेकिन श्रीकृष्ण अपने मित्रो को इकट्ठा करके मानव पिरामिड बनाकर ऊँचे स्थान से भी मक्खन चुरा लिया करते थे।

इसलिए आज पूरे भारतवर्ष में भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की इस नटखट प्रसंग को याद करने के लिए दही हांड़ी का पर्व मनाया जाता है।

दही हांडी का महत्व

दही हांड़ी का भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है। इस महोत्सव में युवाओ द्वारा टीमें बनायीं जाती है जो आपस में एक साथ मिलकर अपनी टीम को विजेता बनाने का प्रयास करते है जिससे आपसी भाईचारे और टीमवर्क को बढ़ावा मिलता है।

भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का सन्देश देती है। यह महोत्सव साहस और आपसी रणनीति का प्रतीक भी है जिसमे युवाओ को अपने साहस को दिखाने का अवसर मिलता है।

दही हांड़ी का पर्व आजकल के युवाओ को शारीरिक फिटनेस बनाये रखने का सन्देश भी देती है साथ ही साथ युवाओ को खेल भावना के प्रति भी प्रेरित करती है।

दही हांडी 2025: सुरक्षा नियम और दिशानिर्देश

दही हांड़ी के पर्व में हांड़ी को ऊंचाई पर लटकाया जाता है जिससे दुर्घटना होने का खतरा बना रहता है साथ ही अधिक भीड़ होने व मानव पिरामिड के ऊंचाई से गिरकर चोटिल का खतरा भी बना रहता है।

इस वजह से जंहा पर भी दही हांड़ी पर्व का आयोजन होता है वंहा के स्थानीय प्रशासन द्वारा कुछ गाइडलाइन बनायीं गयी है जिससे किसी भी प्रकार की दुर्घटना को होने से रोका जा सके।

दही हांड़ी की ऊंचाई को लेकर भी नियम बनाया गया है जिसमे अधिकतम ऊंचाई 20 फ़ीट तय की गयी है ताकि गिरने पर गंभीर चोटों से बचा जा सके। इसमें प्रतिभागी की उम्र को लेकर भी गाइडलाइन दी गयी है जिसमे प्रतिभागी की उम्र 14 वर्ष से कम नई होनी चाहिए।

सभी प्रतिभागियों के लिए हेलमेट, कमर बेल्ट, सेफ्टी मेट और घुटना गार्ड अनिवार्य किया गया है जिससे किसी भी प्रतिभागी को किसी भी प्रकार की गंभीर चोट न लगे। इसके साथ ही सभी टीमों को अपना रजिस्ट्रेशन और हेल्थ चेकअप करवाना भी जरुरी है।

भीड़ प्रबंधन, मेडिकल टीमों की उपलब्धता और एम्बुलेंस की व्यवस्था आयोजकों को करनी होगी। इन नियमो का उद्देश्य दही हांड़ी के पर्व को हर्षोउल्लास के साथ मानना व किसी भी अप्रिय घटना को होने से रोकना है।

निष्कर्ष (Conclusion)

दही हांड़ी एक पर्व ही नहीं बल्कि भारतीय एकता का प्रतीक है जो हमें आपसी भाईचारे और टीमवर्क के महत्व को सिखाता है। यह पर्व लाखो लोंगो को एक साथ जोड़ता है साथ ही यह हमें आपस में मिलजुलकर रहने के लिए प्रेरित करता है।

लगभग हर व्यक्ति को इसमें प्रतिभाग करना चाहिए जिससे कि सभी आपस में मिलजुल कर इस महोत्सव का आनंद ले सके व आपसी मतभेद भुलाकर एक दूसरे का सहारा बन सके।

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